Major Mohit Sharma, एसी, एसएम (13 जनवरी 1978 – 21 मार्च 2009) भारतीय सेना की सबसे खतरनाक और एलीट यूनिट ‘1 पैरा (स्पेशल फोर्सेज)’ के एक जांबाज अफसर थे। शांति काल में वीरता के लिए दिए जाने वाले देश के सर्वोच्च सम्मान ‘अशोक चक्र’ से उन्हें मरणोपरांत सम्मानित किया गया। जम्मू-कश्मीर में एक काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन के दौरान उन्होंने जिस अदम्य साहस और बलिदान का परिचय दिया, वह आज भी मिसाल है।
अपने साथियों के बीच वो “माइक” (Mike) के नाम से मशहूर थे। उनकी वीरता की सबसे हैरान करने वाली कहानी वह है जब उन्होंने एक अंडरकवर ऑपरेशन के तहत आतंकवादियों के ग्रुप में घुसपैठ की और फिर पूरे ग्रुप का सफाया कर दिया।
शुरुआती जीवन और पढ़ाई
जन्म और परिवार: मेजर मोहित का जन्म हरियाणा के रोहतक में राजेंद्र प्रसाद शर्मा और सुशीला शर्मा के घर हुआ था। घर में उन्हें प्यार से “चिंटू” बुलाया जाता था।
शिक्षा: उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई मानव स्थली स्कूल (दिल्ली) और बाद में दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS), गाजियाबाद से पूरी की। 1995 में उन्होंने स्कूल पास किया।
जिंदगी का मोड़: उन्होंने महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग कॉलेज (श्री संत गजानन महाराज कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग) में दाखिला लिया था, लेकिन फौज की वर्दी का जुनून उन पर ऐसा सवार था कि उन्होंने इंजीनियरिंग छोड़ दी और 1995 में नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) ज्वाइन कर ली।
फौजी सफर
ट्रेनिंग: NDA में वो “इंडिया स्क्वाड्रन” का हिस्सा थे। बॉक्सिंग, तैराकी और घुड़सवारी में उनका कोई सानी नहीं था। बाद में उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से ट्रेनिंग ली, जहाँ वे बटालियन कैडेट एडजुटेंट (BCA) भी रहे।
कमीशन: 11 दिसंबर 1999 को उन्हें मद्रास रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में कमीशन मिला।
स्पेशल फोर्सेज: जून 2003 में उन्होंने पैरा (स्पेशल फोर्सेज) के लिए वालंटियर किया। बेहद कठिन प्रोबेशन पास करने के बाद, उन्होंने 1 पैरा (SF) ज्वाइन की – वो यूनिट जो अपने गुप्त और खतरनाक ऑपरेशन्स के लिए जानी जाती है।
इंस्ट्रक्टर: 2005 से 2006 तक उन्होंने बेलगाम के कमांडो विंग में एक इंस्ट्रक्टर के तौर पर भी काम किया और युवा सैनिकों को स्पेशल वॉरफेयर के गुर सिखाए।
साहसिक कारनामे और वीरता
1. कोवर्ट ऑपरेशन (2004) - सेना मेडल
मेजर शर्मा ने कश्मीर में एक बेहद जोखिम भरा अंडरकवर मिशन अंजाम दिया, जो उनकी गजब की रणनीति का सबूत था।
मिशन: उन्होंने अपनी पहचान बदलकर “इफ्तिखार भट्ट” का नाम रखा और हिजबुल मुजाहिदीन के एक मॉड्यूल में घुसपैठ कर ली।
प्लान: उन्होंने लंबी दाढ़ी बढ़ाई और आतंकवादियों के साथ रहने लगे। उन्होंने आतंकियों का भरोसा पूरी तरह जीत लिया था।
नतीजा: जैसे ही उन्हें खुफिया जानकारी मिली, उन्होंने दो खूंखार आतंकवादियों को मार गिराया। इस साहसिक कारनामे के लिए उन्हें 2004 में ‘सेना मेडल’ (गैलेंट्री) से नवाजा गया।
2. कुपवाड़ा ऑपरेशन (21 मार्च 2009) - अशोक चक्र
उनका आखिरी मिशन जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर के घने हफरूदा जंगल में था।
घात लगाकर हमला: मेजर शर्मा अपनी ब्रावो असॉल्ट टीम को लीड कर रहे थे, तभी आतंकवादियों ने तीन तरफ से उन पर हमला कर दिया। गोलीबारी इतनी तेज थी कि उनके चार कमांडो शुरू में ही गंभीर रूप से घायल हो गए।
रेस्क्यू: गोलियों की बौछार के बीच, अपनी जान की परवाह किए बिना वे रेंगते हुए आगे बढ़े और अपने दो घायल साथियों को खींचकर सुरक्षित जगह पर ले आए।
बलिदान: इस मुठभेड़ के दौरान उनके सीने में गोली लग गई। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने ग्रेनेड फेंके और दो आतंकवादियों को ढेर कर दिया। जब उन्हें लगा कि उनकी टीम पर खतरा अभी भी बना हुआ है, तो वे बचे हुए आतंकवादियों से भिड़ गए और क्लोज-क्वार्टर बैटल (हाथापाई और नज़दीकी लड़ाई) में दो और आतंकियों को मार गिराया। इसके बाद वे शहीद हो गए।
विरासत (Legacy)
सम्मान: 26 जनवरी 2010 को उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
निजी जीवन: मेजर मोहित एक बेहतरीन गिटारवादक थे और माउथ ऑर्गन भी बहुत अच्छा बजाते थे। उनकी शादी मेजर रिशिमा शर्मा से हुई थी, जो एक आर्मी अफसर थीं और मोहित की शहादत के बाद भी देश सेवा करती रहीं।
यादगार: गाजियाबाद के राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर उनके सम्मान में “मेजर मोहित शर्मा राजेंद्र नगर स्टेशन” रखा गया है।
1 पैरा (स्पेशल फोर्सेज) का इतिहास
उपनाम: रेड डेविल्स (Red Devils) आदर्श वाक्य: शत्रुजीत (The Conqueror)
मेजर मोहित शर्मा ‘द पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज)’ की पहली बटालियन से थे, जिसका भारतीय सेना में एक खास मुकाम है।
सबसे पुरानी बटालियन: सुनने में शायद यकीन न हो, लेकिन 1 पैरा भारतीय सेना की सबसे पुरानी इन्फैंट्री बटालियन है। इसे 1761 में कोस्ट सेपॉय की 8वीं बटालियन के रूप में खड़ा किया गया था और बाद में यह पंजाब रेजिमेंट की पहली बटालियन बनी।
कमांडो में बदलाव: 1978 में इस बटालियन को एक खास रोल के लिए चुना गया। इसने पंजाब रेजिमेंट छोड़ दी, पैराशूट रेजिमेंट में शामिल हुई और इसका नाम ‘1 पैरा (कमांडो)’ हो गया। यह पहली ऐसी बटालियन थी जिसे विशेष रूप से स्पेशल फोर्सेज यूनिट में बदला गया था।
खासियत: वैसे तो सभी SF यूनिट्स हर काम में माहिर होती हैं, लेकिन 1 पैरा (SF) अर्बन वॉरफेयर (शहरी युद्ध), अनकंवेंशनल वॉरफेयर और काउंटर-टेररिज्म में एक्सपर्ट मानी जाती है।
प्रमुख ऑपरेशन्स:
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): स्वर्ण मंदिर परिसर से उग्रवादियों को बाहर निकालने का काम।
ऑपरेशन पवन (श्रीलंका, 1987): LTTE के खिलाफ हेलीबोर्न हमले।
ऑपरेशन कैक्टस (मालदीव, 1988): तख्तापलट की कोशिश के बाद वहां की सरकार को बहाल करने में अहम भूमिका निभाई।
अशोक चक्र से सम्मानित अन्य शूरवीर
अशोक चक्र शांतिकाल में दिया जाने वाला परमवीर चक्र के बराबर का सम्मान है। यह युद्ध के मैदान से दूर “अदम्य साहस, वीरता या आत्म-बलिदान” के लिए दिया जाता है।
यहाँ कुछ और ऐसे ही वीरों की कहानियां हैं, जिनका साहस मेजर मोहित शर्मा जैसा ही था:
हवलदार हंगपन दादा (2016)
यूनिट: असम रेजिमेंट / 35 राष्ट्रीय राइफल्स।
कारनामा: मई 2016 में, जम्मू-कश्मीर के नौगाम सेक्टर की ऊंचाई पर, उन्होंने चार आतंकवादियों को भारत में घुसते देखा। आमने-सामने की लड़ाई में उन्होंने तीन को मार गिराया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने चौथे आतंकवादी को उलझाए रखा ताकि उनकी टीम उसे खत्म कर सके, और फिर प्राण त्याग दिए।
विरासत: उन्हें अरुणाचल प्रदेश के हीरो के रूप में याद किया जाता है।
मेजर मुकुंद वरदराजन (2014)
यूनिट: 22 राजपूत / 44 राष्ट्रीय राइफल्स।
कारनामा: कश्मीर के शोपियां में उन्होंने हिजबुल मुजाहिदीन के तीन टॉप कमांडरों को ढेर करने के लिए एक ऑपरेशन लीड किया। मेजर मुकुंद और उनके साथी सिपाही विक्रम सिंह भारी गोलीबारी के बीच एक बगीचे में रेंगते हुए आगे बढ़े। ग्रेनेड और गोलियों की लड़ाई में मेजर मुकुंद ने तीनों आतंकवादियों को मार गिराया लेकिन वे खुद शहीद हो गए।
लांस नायक नजीर अहमद वानी (2019)
यूनिट: जम्मू और कश्मीर लाइट इन्फैंट्री / 162 इन्फैंट्री बटालियन (टेरिटोरियल आर्मी)।
कारनामा: कभी आतंकवादी रहे वानी बाद में सुधर कर सैनिक बने और दो बार सेना मेडल जीता। शोपियां में एक भीषण मुठभेड़ में, वे उस घर में घुस गए जहां आतंकवादी छिपे थे। उन्होंने दो आतंकवादियों को मार गिराया और तीसरे को घायल कर दिया। कई गोलियां लगने के बाद भी उन्होंने अपने साथियों को बचाया।
खास बात: वह अशोक चक्र पाने वाले पहले कश्मीरी थे।
नीरजा भनोट (1987)
रोल: सीनियर फ्लाइट पर्सर, पैन एम।
कारनामा: भले ही वो कोई सैनिक नहीं थीं, लेकिन उनका अशोक चक्र आइकॉनिक है। जब कराची में पैन एम फ्लाइट 73 हाईजैक हुई, तो उन्होंने अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छिपा दिए ताकि उन्हें बचाया जा सके। उन्होंने इमरजेंसी दरवाजा खोलकर यात्रियों को तो भगा दिया, लेकिन खुद नहीं भागीं और तीन बच्चों को गोलियों से बचाने के लिए अपने शरीर की ढाल बना दी। वह इस पुरस्कार को पाने वाली सबसे कम उम्र की प्राप्तकर्ता हैं।